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इंसान की जात

शीर्षक: इंसान की जात। यह कविता इंसानियत, बराबरी और प्रेम का गहरा संदेश देती है। - बिहार युवा मंच
कविता थंबनेल

BIHAR YUVA MANCH

कविता
Author

दीपक कुमार

साहित्यकार एवं रचनाकार

"मैंने ये पंक्तियाँ सिर्फ शब्दों के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत को जगाने के लिए लिखी हैं। हम सब एक ही मिट्टी से बने हैं और एक दिन उसी में मिल जाने वाले हैं। न कोई धर्म बड़ा है, न कोई छोटा — सबसे बड़ा अगर कुछ है, तो वो है इंसानियत। अगर मेरी ये कविता आपके दिल को छू जाए, तो नफ़रत नहीं, मोहब्बत फैलाइए… क्योंकि दुनिया को आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत इंसान बनने की है।"

कलम की ताकत समाज का असली दर्पण है। मेरी हर रचना समाज के प्रति एक छोटी सी जिम्मेदारी है जो शब्दों के माध्यम से पूरी होती है।

BYM Watermark

शीर्षक: इंसान की जात

मिट्टी का एक ढेला हूँ मैं, मिट्टी में मिल जाऊँगा, न हिंदू, न मुस्लिम, न ऊँच-नीच संग ले जाऊँगा। जिस लहू का रंग लाल है, उसे क्यों रंगों में बाँट दिया? इंसानियत के बाग को, तुमने नफ़रत से क्यों काट दिया? अस्पताल की उस बोतल में, क्या खून की जाति पूछते हो? जब प्यास लगे भीषण तो क्या, पानी की जाति पूछते हो? साँसें सबकी एक जैसी, सबका एक ही आसमान है, फिर क्यों गलियों में बँटा हुआ, आज ये हिंदुस्तान है? शमशान की उस राख में, कोई भेद बता कर दिखाओ, किसकी अस्थि ऊँची है, ज़रा ढूँढ कर तुम लाओ। ईश्वर ने तो भेजा था, बस एक 'आदमी' बनाकर, हमने उसे ही बाँट दिया, यहाँ 'दीवारें' सजाकर। जात-पात की इस आग में, सिर्फ़ घर ही जलते हैं, नफ़रत के इन काँटों पर, मासूम पाँव ही चलते हैं। कहाँ लिखा है वेदों में, कि इंसान से नफ़रत पालें? आओ मिलकर इस समाज से, ये ज़हरीला जाल निकालें। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे—सब एक ही राह दिखाते हैं, पर हम नादान हैं जो, बस सरहदों पर चिल्लाते हैं। भूल जाओ इन बेड़ियों को, अब हाथ बढ़ाना सीखो, जात बड़ी नहीं होती, 'जज्बात' बढ़ाना सीखो।
रचनाकार : दीपक कुमार
आभार एवं धन्यवाद
Founder

Founder & Author

Deepak Kumar

"बिहार युवा मंच का संकल्प है कि हर दबी हुई आवाज को साहित्य के माध्यम से एक सशक्त मंच मिले।"

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