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BIHAR YUVA MANCH
कविता

शीर्षक: संस्कारों की दहलीज़
ओ री लाडो, ज़रा देख उन हाथों की लकीरें,
बाप ने बेची हैं अपनी खुशियाँ और तक़दीरें।
फटी बिवाइयां पैरों की, माँ का वो पुराना आँचल,
तेरी पढ़ाई की खातिर, वो भूखे रहे हर पल।
शहर की चकाचौंध में, क्यों घर का दीया भूल गई?
दो दिन के झूठे प्यार में, बरसों का साया भूल गई?
जिस बाप ने पसीना बहाकर, तेरी कलम खरीदी थी,
क्या उसकी इज़्ज़त की कीमत, बस इतनी ही सीधी थी?
प्यार बुरा नहीं होता, पर पहचानना सीखो तुम,
ज़हरीले मीठे शब्दों को, अब जानना सीखो तुम।
वो जो कसमें खाता है, क्या तेरे अपनों से बढ़कर है?
तेरी एक ग़लती से, तेरे पिता का झुकता सर है।
मत लगा प्रश्नचिह्न उस कुल पर, जिसने तुझे पाला है,
उस माँ के विश्वास पर, जिसने तुझे संभाला है।
उड़ना ज़रूर आसमान में, पर ज़मीन याद रखना,
खून-पसीने की उस कमाई की, तुम लाज रखना।
बन 'कविता' तुम ऐसी, जो गर्व का नया गान बने,
तेरी सफलता से ही, तेरे माँ-बाप की पहचान बने।
आभार एवं धन्यवाद
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