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संस्कारों की दहलीज़

शीर्षक: संस्कारों की दहलीज़। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हम दुनिया में चाहे कितनी भी ऊँचाई छू लें, हमारे पैर हमेशा अपनी जड़ों और नैतिक मूल्यों से जुड़े रहने चाहिए। - बिहार युवा मंच
कविता थंबनेल

BIHAR YUVA MANCH

कविता
Author

दीपक कुमार

साहित्यकार एवं रचनाकार

संस्कार वह अदृश्य शक्ति हैं जो हमें भीड़ में भी अलग पहचान दिलाते हैं। यह कविता 'संस्कारों की दहलीज़' हमें याद दिलाती है कि हम दुनिया में चाहे कितनी भी ऊँचाई छू लें, हमारे पैर हमेशा अपनी जड़ों और नैतिक मूल्यों से जुड़े रहने चाहिए।

कलम की ताकत समाज का असली दर्पण है। मेरी हर रचना समाज के प्रति एक छोटी सी जिम्मेदारी है जो शब्दों के माध्यम से पूरी होती है।

BYM Watermark

शीर्षक: संस्कारों की दहलीज़

ओ री लाडो, ज़रा देख उन हाथों की लकीरें, बाप ने बेची हैं अपनी खुशियाँ और तक़दीरें। फटी बिवाइयां पैरों की, माँ का वो पुराना आँचल, तेरी पढ़ाई की खातिर, वो भूखे रहे हर पल। शहर की चकाचौंध में, क्यों घर का दीया भूल गई? दो दिन के झूठे प्यार में, बरसों का साया भूल गई? जिस बाप ने पसीना बहाकर, तेरी कलम खरीदी थी, क्या उसकी इज़्ज़त की कीमत, बस इतनी ही सीधी थी? प्यार बुरा नहीं होता, पर पहचानना सीखो तुम, ज़हरीले मीठे शब्दों को, अब जानना सीखो तुम। वो जो कसमें खाता है, क्या तेरे अपनों से बढ़कर है? तेरी एक ग़लती से, तेरे पिता का झुकता सर है। मत लगा प्रश्नचिह्न उस कुल पर, जिसने तुझे पाला है, उस माँ के विश्वास पर, जिसने तुझे संभाला है। उड़ना ज़रूर आसमान में, पर ज़मीन याद रखना, खून-पसीने की उस कमाई की, तुम लाज रखना। बन 'कविता' तुम ऐसी, जो गर्व का नया गान बने, तेरी सफलता से ही, तेरे माँ-बाप की पहचान बने।
रचनाकार : दीपक कुमार
आभार एवं धन्यवाद
Founder

Founder & Author

Deepak Kumar

"बिहार युवा मंच का संकल्प है कि हर दबी हुई आवाज को साहित्य के माध्यम से एक सशक्त मंच मिले।"

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