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BIHAR YUVA MANCH
कविता

शीर्षक: इंसान की जात
मिट्टी का एक ढेला हूँ मैं, मिट्टी में मिल जाऊँगा,
न हिंदू, न मुस्लिम, न ऊँच-नीच संग ले जाऊँगा।
जिस लहू का रंग लाल है, उसे क्यों रंगों में बाँट दिया?
इंसानियत के बाग को, तुमने नफ़रत से क्यों काट दिया?
अस्पताल की उस बोतल में, क्या खून की जाति पूछते हो?
जब प्यास लगे भीषण तो क्या, पानी की जाति पूछते हो?
साँसें सबकी एक जैसी, सबका एक ही आसमान है,
फिर क्यों गलियों में बँटा हुआ, आज ये हिंदुस्तान है?
शमशान की उस राख में, कोई भेद बता कर दिखाओ,
किसकी अस्थि ऊँची है, ज़रा ढूँढ कर तुम लाओ।
ईश्वर ने तो भेजा था, बस एक 'आदमी' बनाकर,
हमने उसे ही बाँट दिया, यहाँ 'दीवारें' सजाकर।
जात-पात की इस आग में, सिर्फ़ घर ही जलते हैं,
नफ़रत के इन काँटों पर, मासूम पाँव ही चलते हैं।
कहाँ लिखा है वेदों में, कि इंसान से नफ़रत पालें?
आओ मिलकर इस समाज से, ये ज़हरीला जाल निकालें।
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे—सब एक ही राह दिखाते हैं,
पर हम नादान हैं जो, बस सरहदों पर चिल्लाते हैं।
भूल जाओ इन बेड़ियों को, अब हाथ बढ़ाना सीखो,
जात बड़ी नहीं होती, 'जज्बात' बढ़ाना सीखो।
आभार एवं धन्यवाद
1 Comments
अति सुंदर
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