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BIHAR YUVA MANCH
कविता

शीर्षक: ऋण (कर्ज)
वो फटे जूतों में चलकर, तुझे ब्रांडेड जूते पहनाता रहा,
खुद भूखा सोया कई रातें, तुझे निवाला खिलाता रहा।
जिसने उंगली थामकर, तुझे चलना सिखाया था,
आज दो पैसे क्या कमाए, तूने उन्हें ही नीचा दिखाया है?
तेरी हर जिद के आगे, वो अपनी हस्ती मिटाते रहे,
तू धूप में न जले कभी, वो खुद को धूप में जलाते रहे।
वो बूढ़े हाथ जो कांप रहे हैं, वो कमजोरी नहीं निशान हैं,
तेरे कल को बनाने में, खर्च हुई उनकी जान है।
कड़वे बोल जो बोले तूने, वो घाव बनकर चुभते हैं,
औलाद जब पत्थर हो जाए, तो माँ-बाप जिंदा ही डूबते हैं।
याद रख, समय का चक्र बड़ा है, कल तू भी बूढ़ा होगा,
जैसा बोया है तूने आज, वैसा ही फल तेरा भी होगा।
महल खड़ा कर लेगा तू, पर घर में सुकून न पाएगा,
अगर दुआ न ली उनकी, तो दर-दर की ठोकरें खाएगा।
लौट आ अभी भी वक्त है, उनके चरणों में जन्नत है,
माता-पिता ही इस दुनिया में, खुदा की सबसे बड़ी मन्नत हैं।
आभार एवं धन्यवाद
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