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ऋण (कर्ज)

शीर्षक: ऋण (कर्ज)। यह कविता हमें सिखाती है कि दुनिया की हर दौलत माता-पिता के त्याग के आगे तुच्छ है। वे हमारे जीवन की 'जन्नत' हैं, उन्हें बोझ समझने की भूल, खुद के विनाश का मार्ग है। - बिहार युवा मंच
कविता थंबनेल

BIHAR YUVA MANCH

कविता
Author

दीपक कुमार

साहित्यकार एवं रचनाकार

तुम्हारी सफलता की नींव माता-पिता के त्याग और उनके फटे जूतों से बनी है। पैसा फिर मिल जाएगा, पर उनके कांपते हाथों की दुआएं और आंचल की छाँव दोबारा नहीं मिलेगी। उन्हें बोझ मत समझो; दुनिया के किसी भी महल में वो सुकून नहीं मिलेगा जो उनके चरणों की जन्नत में है। उनकी कद्र जीते-जी कर लेना ही तुम्हारी असली जीत है।

कलम की ताकत समाज का असली दर्पण है। मेरी हर रचना समाज के प्रति एक छोटी सी जिम्मेदारी है जो शब्दों के माध्यम से पूरी होती है।

BYM Watermark

शीर्षक: ऋण (कर्ज)

वो फटे जूतों में चलकर, तुझे ब्रांडेड जूते पहनाता रहा, खुद भूखा सोया कई रातें, तुझे निवाला खिलाता रहा। जिसने उंगली थामकर, तुझे चलना सिखाया था, आज दो पैसे क्या कमाए, तूने उन्हें ही नीचा दिखाया है? तेरी हर जिद के आगे, वो अपनी हस्ती मिटाते रहे, तू धूप में न जले कभी, वो खुद को धूप में जलाते रहे। वो बूढ़े हाथ जो कांप रहे हैं, वो कमजोरी नहीं निशान हैं, तेरे कल को बनाने में, खर्च हुई उनकी जान है। कड़वे बोल जो बोले तूने, वो घाव बनकर चुभते हैं, औलाद जब पत्थर हो जाए, तो माँ-बाप जिंदा ही डूबते हैं। याद रख, समय का चक्र बड़ा है, कल तू भी बूढ़ा होगा, जैसा बोया है तूने आज, वैसा ही फल तेरा भी होगा। महल खड़ा कर लेगा तू, पर घर में सुकून न पाएगा, अगर दुआ न ली उनकी, तो दर-दर की ठोकरें खाएगा। लौट आ अभी भी वक्त है, उनके चरणों में जन्नत है, माता-पिता ही इस दुनिया में, खुदा की सबसे बड़ी मन्नत हैं।
रचनाकार : दीपक कुमार
आभार एवं धन्यवाद
Founder

Founder & Author

Deepak Kumar

"बिहार युवा मंच का संकल्प है कि हर दबी हुई आवाज को साहित्य के माध्यम से एक सशक्त मंच मिले।"

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