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सोती किस्मत को जगाना है

सोती किस्मत को जगाना है

अंधेरों की चादर ओढ़े, वह कब से मौन है, तेरी राह देख रही, पूछती तू कौन है? किस्मत के भरोसे बैठना, कायरों की रीति है, परिश्रम से ही बदलती, समय की प्रीति है। मत कह कि तेरी तक़दीर सो रही है, वह तो बस तेरे प्रयासों में खो रही है। जब तू पसीने की बूंदों से, माटी को सींचेगा, तभी तो तू सफलता को, अपनी ओर खींचेगा। चोट जितनी गहरी होगी, पत्थर मूरत बनता है, संघर्ष की आग में तपकर ही, सोना कुंदन बनता है। अपनी मेहनत की दस्तक से, उस सोई किस्मत को जगा, मंजिल तेरे पास आएगी, तू बस कदम आगे बढ़ा।
— रचनाकार: दीपक कुमार
Writer

Deepak Kumar

Founder & Author.

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