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घर का बड़ा बेटा

शीर्षक: घर का बड़ा बेटा। यह कविता हमें सिखाती है कि घर का बड़ा बेटा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि वो ढाल है जो पूरे परिवार की मुश्किलों को खुद पर झेलता है। अपनी ख्वाहिशों का गला घोंटकर, छोटे भाई-बहनों के सपनों में रंग भरने वाला वो 'दूसरा पिता' होता है।- बिहार युवा मंच
कविता थंबनेल

BIHAR YUVA MANCH

कविता
Author

दीपक कुमार

साहित्यकार एवं रचनाकार

घर का बड़ा बेटा वह मज़बूत पेड़ है जो खुद धूप में जलकर पूरे परिवार को छाँव देता है। छोटे भाई-बहनों की मुस्कान के लिए उसने अपने खिलौनों से लेकर अपने सपनों तक की बलि दे दी। उसके कंधों पर सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं, माँ-बाप की उम्मीदों का आसमान है। वह टूटता नहीं, क्योंकि उसे पता है कि उसके बिखरने से पूरा घर बिखर जाएगा। बड़ा बेटा होना कोई पद नहीं, अपनों के लिए खुद को धीरे-धीरे खर्च कर देने का एक 'मौन संकल्प' है।

कलम की ताकत समाज का असली दर्पण है। मेरी हर रचना समाज के प्रति एक छोटी सी जिम्मेदारी है जो शब्दों के माध्यम से पूरी होती है।

BYM Watermark

शीर्षक: घर का बड़ा बेटा

वह सिर्फ एक नाम नहीं, पूरे घर की नींव होता है, अपनी खुशियों को अपनों के लिए, चुपचाप सींव देता है। बचपन उसका खिलौनों से नहीं, जिम्मेदारियों से बीतता है, वो हारकर भी अपनों को, हर हाल में जीतता है। पिता का वह साया है, माँ की वह उम्मीद है, भाई-बहनों के सपनों की, वह सबसे पक्की रसीद है। अपनी नई कमीज को वो, अक्सर टाल देता है, छोटे की जिद पूरी हो, बस यही ख्याल पाल लेता है। थकावट चेहरे पर होती है, पर मुस्कान नहीं खोती, उसकी रातों की नींद, शायद चैन से नहीं सोती। कंधों पर बोझ है भारी, पर वो अडिग खड़ा रहता है, घर का बड़ा बेटा, बिना कहे सब कुछ सहता है।
रचनाकार : दीपक कुमार
आभार एवं धन्यवाद
Founder

Founder & Author

Deepak Kumar

"बिहार युवा मंच का संकल्प है कि हर दबी हुई आवाज को साहित्य के माध्यम से एक सशक्त मंच मिले।"

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